बात जब आधा गिलास पानी की होती है तो इसे दो तरह से परिभाषित किया जाता है गिलास आधा भरा है या पानी आधा गिलास ही है। यह कहने वाले और सोचने वाले के विवेक पर निर्भर है। कितनी मात्रा में पानी की जरूरत है मिल कितना रहा है आवश्यकता अनुरूप पानी कितनी मात्रा में होना चाहिए। लेकिन मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि जिसे कहीं कोई दबाना चाह रहा है वही समाचार है शेष विज्ञापन है। इसका विश्लेषण ऐसे भी हो सकता है कि प्रायोजित कोई भी कार्यक्रम कि अगर प्रेस विज्ञप्ति दी जाती है और उसमें शामिल होने के लिए अनुरोध नहीं किया जाता या उसकी जानकारी नहीं दी जाती तो वह विज्ञापन के रूप में रह जाता है यही कि प्रायोजक जो लिखित रूप से देंगे रिपोर्टर को सिर्फ वही पता होगा वस्तु स्थिति नहीं। आजकल हर क्षेत्र में ऐसा ही हो रहा है। कर्मचारी अधिकारी और प्रतिनिधि से मैंने कह भी दिया आप जो रिपोर्ट देंगे वह खबर है यह जरूरी नहीं। उस जगह पर जो मैंने देखा जो लोगों से सुना वह खबर है । प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी उपलब्धियों को बेशकीमती बताते हुए जो खबर दी जाती है रिपोर्टर का यह भी दायित्व है कि बाकी बची रिपोर्ट या छूटे हुए पक्ष व पेंडिंग की जानकारी भी उतनी ही विस्तार पूर्वक ली जाए। या फिर समीक्षा कर उस विभागीय कार्यालय से संबंधित कोई भी सवाल पूछ कर संतोषजनक जवाब प्राप्त करने में रुचि हो । बात अगर सरकार की योजनाओं से लाभान्वित होने की हो तो लाभान्वित होने और न होने की जानकारी तो अलग है लाभान्वित न होने के आधिकारिक बयान के साथ और स्पष्ट कारणों की भी रिपोर्टिंग हो। बात अगर क्राइम की हो उद्भेदन जल्द हुआ अच्छी बात लेकिन जिस केस का उद्भेदन नहीं हुआ और लंबे समय से पेंडिंग है उस पर भी थोड़ी चर्चा हो।
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एक प्रयास
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घर बैठे हो रही है रिपोर्टिंग, नहीं मिलती है स्पष्ट जानकारी।
पीड़ित या आरोपी के शारीरिक प्रतिक्रिया, हाव-भाव, स्थान का माहौल इत्यादि की जानकारी रिपोर्टर स्थल पर रहकर इतनी अच्छे से कर लेगा वह दूरभाष पर दूसरे के द्वारा दी गई जानकारी से स्पष्ट नहीं होगा।लेकिन विज्ञापन जो ना करा दे। यह भी कड़वा सच है कि प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया वाले का ए टू जेड खर्च विज्ञापन पर ही निर्भर है। या फिर खबरों को चलाने या ना चलाने के एवज में। दूसरा कोई सोर्स ऑफ इनकम ना होने की वजह से खबरों से समझौता करना लाजमी है। ऐसे में आज के समय में निष्पक्ष पत्रकारिता (जो दिखेगा वही छपेगा) पीड़ित, आरोपी संबंधित जनप्रतिनिधि और अधिकारी के बयान के साथ खबर पाना बड़ी मुश्किल है। आप तक वही खबरें पहुंच रही हैं जो विज्ञापनदाता प्रेस विज्ञप्ति में देते है या खबर संकलन करना करने में कोई मेहनत नहीं करना चाहता किसी और के द्वारा संकलन की गई खबरों को बिना उनकी अनुमति के उपयोग किया जाता है। कभी-कभी तो जल्दी बाजी में जो खबर जैसे सूत्रों से मिली वैसे ही खबरों को ब्यूरो के पास या डेस्क पर भेज दिया जाता है क्रॉस वेरिफिकेशन तक नहीं किया जाता। ऐसे में खबरों के लिए आजकल जितने भी सोर्स हैं उस पर से पाठक, श्रोता या दर्शक का विश्वास कम होता चला गया इसे फिर से हासिल करना एक बड़ी चुनौती है।
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