श्रमिक हुए धन्ना सेठ, घर बैठे मुफ्त सुविधाओं व सेवाओं के कारण काम करने से परहेज। - Rtikudra.blogspot.com

भ्रष्टाचार और कुरीतियों पर लेखनी से प्रहार

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13 जून 2023

श्रमिक हुए धन्ना सेठ, घर बैठे मुफ्त सुविधाओं व सेवाओं के कारण काम करने से परहेज।

 स्वस्थ लोगों को मानसिक अपाहिज बना रही सरकार।


कुदरा (कैमूर) {रमेश कुमार}[बिहार] 


 प्रतीकात्मक तस्वीर स्रोत इंटरनेट

सरकार ने गरीबी मापने की रेखा तय की है गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग बीपीएल, गरीबी रेखा से ऊपर जीवन यापन करने वाले एपीएल और गरीब। इन तीन श्रेणियों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने का मतलब कि गरीब से भी गरीब, गरीबी के निचले स्तर पर। जिन्हें मूलभूत सुविधाएं यथा रोटी, दो वक्त का भोजन, कपड़ा, जाड़ा गर्मी और बरसात में तन ढंकने के लिए मौसम अनुरूप वस्त्र और मकान, एक छत जरूरी सामान सुरक्षित रखने और धूप, बारिश और ठंड से बचने, सही समय पर इलाज चिकित्सा सुविधा, शिक्षा उम्र के समयानुसार जरूरत के अनुरूप नहीं मिल पाती।

एपीएल की श्रेणी - हमारे यहां स्टेटस सिंबल में बच्चों को प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाने, प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने, यात्रा के लिए निजी या किराये की गाड़ी उपयोग करने,आलीशान भवन में जरूरतों और सुख संबंधी के साथ विलासिता संबंधित सामग्री का उपयोग करने, बार-बार सूट बूट बदलने वाले इस श्रेणी में आते हैं।

 जॉब कार्ड की तस्वीर।

पर गरीब बड़े-बड़े शहरों और महानगर में एक खास स्थान पर मजदूर वर्ग के लोग इकट्ठा हो जाते हैं जहां से जरूरत के हिसाब से समय और पैसे का निर्धारण कर श्रमिक कार्य पर जाते हैं। ऐसे में विषम परिस्थिति तब हो जाती है जब स्थानीय क्षेत्रों में मील और कल कारखाने हो वहां श्रमिक मिलना आसान नहीं होता। यही हाल हमारे कैमूर जिला के कुदरा प्रखंड का है। जहां सैकड़ों राइस मील है। वाहनों से धान आते ही उसे अनलोड करने यानि उतारकर मील में रखने, मिल चलाने वाले श्रमिक और धान से चावल तैयार हो जाने पर चावल को ट्रक पर लोड करने की प्रक्रिया में श्रमिक कम समय में भरण पोषण भर पैसा पा लेते हैं। गेहूं के सीजन में फ्लावर मिल में गेहूं उतारने आटा कंप्लीट होने पर उसे लोड करने यहां तक की पक कर तैयार किसान की फसल ब्रोकर के माध्यम से सीधे बाहर भेजने हेतु ट्रैक्टर से आए माल को अन लोड कर ट्रक पर लोड करने में स्थानीय श्रमिक की महत्वपूर्ण भूमिका है।

एससी, एसटी, ओबीसी, दलित, अल्पसंख्यक व पिछड़े वर्ग के लोगों जो कृषि कार्य और भवन निर्माण में लगे हुए थे आजकल वे कृषि कार्य और भवन निर्माण कार्य को सीधे ना कर देते हैं या मुंह मांगी कीमत मांगते हैं। यानी कि श्रमिक दर पर काम करने पर कोई भी तैयार नहीं है। जैसा कि हम सभी को पता है मनरेगा में कुआं, तालाब, पोखर, जलाशय, नहर,आहर,पईन का पुनर्निर्माण या साफ-सफाई, बागवानी, वृक्षारोपण की देखरेख, पशुपालन, मत्स्य पालन जैसी योजनाओं के क्रियान्वयन में पूर्ण भागीदारी या सहयोग शामिल है। लेकिन आजकल यह सारी सुविधाएं मशीन से उपलब्ध हो जाती हैं कुछ शेष सुविधाएं जिसमें मशीन का उपयोग नहीं हो पा रहा उसमें ठेकेदारी प्रथा से इसे पूरा कराया जा रहा जिसका लाभ मनरेगा मजदूरों को कम कार्य कराने वाले को ज्यादा हो रहा।भवन निर्माण और कामकाजी श्रमिक के तौर पर पंजीकरण कराने और मनरेगा की सूची में ऐसे नाम शामिल है जो संपन्न परिवार से हैं, इन कार्यों से दूर-दूर तक जिनका रिश्ता नहीं है। और वह हो भी कैसे ना। मैं तो पूर्ण रूप से इसके लिए सरकार को ही दोषी मानूंगा। युवावस्था में फिजिकली फिट रहने के बाद भी दलित और गरीब परिवारों को मानसिक दिव्यांग सरकार बना रही है। मैंने माना कि रोटी कपड़ा और मकान मूलभूत सुविधाओं में एक है। समय के साथ स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी, सड़क, बिजली, साफ-सफाई, संचार सुविधा इत्यादि भी शामिल है।

इसके लिए सरकार ने पहले से ही व्यवस्था कर रखी है। कोरोना काल से ही सरकार मुफ्त खाद्यान्न का वितरण करवा रही है, हर घर आवास योजना के तहत भूमिहीन को भूमि दिला कर आवास बनवाया जा रहा है। मुफ्त बिजली कनेक्शन, गैस कनेक्शन, मुफ्त चिकित्सा, मुफ्त शिक्षा, हर घर नल का जल, नाली गली इत्यादि मूलभूत सुविधाएं हो जाने से सही सलामत लोग भी अपाहिज बन बैठे हैं। किराना सामान, नमक, तेल, सर्फ साबुन जैसे घर की जरूरी चीजें, सब्जी, मोबाइल फोन रिचार्ज इत्यादि के लिए लोगों के पास वैकल्पिक तौर पर या तो सम्मान निधि योजना का लाभ है या तो मनरेगा जॉब कार्ड या चुनाव के समय सरकार द्वारा दिया जाने वाला लॉलीपॉप पर्याप्त है।

स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि भी दबी जुबान से बताते हैं कि सम्मान निधि योजना के पात्र लाभुक आज भी लाभ से वंचित हैं। मनरेगा जॉब कार्ड धारकों को मजदूरी के कुछ प्रतिशत का भुगतान यह लालच दे करके किया जाता है कि मशीन से काम होगा आप पैसा अपने अकाउंट से निकाल कर दीजिएगा। बिना काम किए कुछ मिल जाएगा कौन नहीं चाहता। सरकार का यही सिस्टम लोगों को कामचोर बना रहा है। नहीं तो ऐसा कैसे होता कि सरकार ₹228 दैनिक मजदूरी पर काम कराती और समाज में वर्तमान में निर्धारित दर ₹350 दैनिक मजदूरी पर भी उसी कार्य के लिए मजदूर नहीं मिलते।

आज भी आपके गली मोहल्ले में मजदूर पंजीकरण कराकर श्रमिक कार्ड बनवाने वाले लोग नशे में धुत होकर पत्ते खेलते या नशा का गुण गाते मिल जाएंगे। आए दिन स्थानीय क्षेत्रों में युवा वर्ग नशेड़ी बन चोरी, छिनतई, ठगी व लूट का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर रहा है। पूरे प्रकरण को देखने समझने और लोगों से मिलकर बात करने से ऐसा प्रतीत होता है कि वह दिन दूर नहीं जिस दिन किसी कारण सरकार की मुफ्त सेवाएं कुछ दिन के लिए लड़खड़ा जाए तो युवा वर्ग को भी भूखे पेट रहने की नौबत आ जाए।।

नोट - इस पोस्ट में श्रमिक, जनप्रतिनिधि समाजसेवी और स्थानीय लोगों का राय शामिल हैं।


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